क्या है संवत्सर और आपके लिए क्या होगा इसका फल

प्रसंगवश: राकेश पाठक

आज हम यानि भारतीय दुनियां में सबसे पहले 21वींं सदी के 76वें साल में प्रविष्ट हो गए जबकि, बाकी दुनियां 19वें साल में ही चल रही है यानि हमसे 57 साल (आधी सदी से भी ज्यादा) पीछे चल रही है।

यह हमारे लिए, सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए गर्व और गौरव का विषय है। हम जानते ही हैं कि, आज से 21-22 सदी पूर्व उज्जयिनी (उज्जैन मप्र) के राजा विक्रमादित्य ने चैत्र मास की शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से पंचांग का आरंभ किया था, इसलिए आज का दिन ही साल का पहला दिन कहलाता है।

राजा विक्रमादित्य द्वारा आरंभ पंंचांग (कैलेंडर) को हिंदू पंचांग या भारतीय पंचांग कहा गया, जो सौर्य मंडल, ग्रह नक्षत्रों की गति-गणना आदि पर आधारित है। इसीलिए बाद में आरंभ हुए दुनियां के अन्य पंचांगों (कैलेंडर्स) की अपेक्षा आज भी सर्वाधिक प्रमाणिक है। हालांकि, सुविधा की दृष्टि से पूरी दुनियां में ईसा से आरंभ होने वाला कैलेंडर मान्य है, जिसके अनुसार आज विक्रम संवत 2076 के पहले दिन यानि चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि 06 अप्रेल 2019 है।

विक्रम संवत यानि भारतीय पंचांग प्रकृति व ज्योतिष आधारित है। ज्योतिषीय गणनानुसार प्रतिवर्ष के ग्रह नक्षत्रों की संभावित क्षमतानुसार उनकी शक्तियों व अधिकारों का अनुमान वर्षारंभ से पूर्व ही कर लिया जाता है। साल 2076 में किस ग्रह की क्या हैसियत होगी, यह जानकारी विद्वान ज्योतिर्विदों द्वारा कर ली गई है, वह यहां साभार संभावित परिणाम सहित प्रस्तुत कर रहा हूं;

विद्वानों के अनुसार विक्रम संवत के आरंभ को संवत्सर कहा जाता है, हर साल नये संवत्सर को नया नाम दिया जाता है। विक्रम संवत 2076 को ‘परिधावी सम्वतसर’ नाम दिया गया है।

परिधावी संवत्सर का राजा- शनि, मंत्री- सूर्य, सस्येश- बुध, धान्येश- चंद्र, मेघेश- शनि, रसेश- शुक्र, नीरसेश- बुध, फलेश- शनि, धनेश- मंगल और दुर्गेश- शनि होंगे।

नवीन (परिधावी) संवत्सर का फल:
शास्त्र नियमानुसार नव संवत का प्रारंभ तथा राजा का निर्णय चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के वार अनुसार ही किया जाता है शनिवार से नवसंवत प्रारंभ होने से आगामी वर्ष संवत का राजा भी शनि ही होगा राजा शनि होने से इनका वाहन भैसा होगा। इसलिए प्रचलित परंपरा अनुसार संवत आरंभ में विद्यमान संवत्सर को विक्रमी संवत आरंभ काल से संवत समाप्ति तक धार्मिक अनुष्ठान जप, पाठ, दान आदि, संकल्प कार्यों के आरंभ में प्रयोग किया जाएगा अर्थात परिधावी नामक संवत का प्रयोग होगा धार्मिक कर्मकांडी विद्वान 6 अप्रैल 2019 के बाद परिधावी नामक संवत्सर का उच्चारण कर सकते हैं।

परिधावी नामक संवत्सर में विभिन्न देशों के मध्य युद्धजन्य परिस्थितियां बने श्रावण भाद्रपद में कम वर्षा होगी खंडित अर्थात कहीं कम कहीं अधिक वर्षा होने से अन्न का उत्पादन मध्यम हो तथा अनाज धान्यादि के मूल्य में विशेष वृद्धि होगी। देश में धंन धान्य की वृद्धि होने के बावजूद भी भय व आशंकाओं से भरा माहौल रहेगा चौपाये गाय, भैंस, घोड़ा, हाथी आदि इनको पीड़ा और कष्ट होगी फल रस आदि पदार्थ भी महंगे होंगे परंतु चांदी पीतल आदि धातुओं के मूल्य में गिरावट होगी संवत आरंभ में यद्यपि परिधि नामक संवत्सर ही प्रचलित रहेगा परंतु 10 अप्रैल 2019 ईस्वी के बाद प्रमादी नाम संवत्सर प्रभावी रहने से इसका फल भी संवत काल में परिलक्षित होगा शास्त्र में प्रमादी संवत्सर का फल इस प्रकार वर्णित है।

प्रभारी संवत्सर में सभी प्रकार के धान्य फसलों अनाज का यथेष्ट उत्पादन होगा। सब रस आदि पदार्थ गुड, चीनी आदि के मूल्य में वृद्धि होगी। सुभिक्ष एवं सुख हो आषाढ़ मास में वर्षा कम हो, भाद्रपद मास में वर्षा अधिक होगी धान्य में 3 गुना तक लाभ प्राप्त होगा।

1. राजा शनि का फल:
वर्ष का राजा शनि हो तो भी बेमौसम एवं भी बेमौका वर्षा होने से दुर्भिक्ष अकाल जैसी स्थिति बनेगी लोग विभिन्न प्रकार के पेचीदा रोगों के कारण परेशान व पीड़ित होंगे राजनेताओं में परस्पर वैमनस्य विरोध व टकराव की स्थिति चरम पर रहेगी कहीं भूमंडल पर विरोधी देशों के मध्य टकराव व युद्ध जन्य परिस्थितियां बनेंगी। चोरी, ठगी, डकैती एवं लूटमार आदि की घटनाएं अधिक होंगी जिन कारण लोग परेशान और दुखी होंगे किसी प्रदेश विशेष में अथवा देश में लोग दुर्भिक्ष बाढ़ आदि प्राकृतिक प्रकोप के कारण अथवा आतंकी घटनाओं से परेशान होकर अन्य प्रदेशों में पलायन करने का विचार करेंगे।

2. मंत्री सूर्य का फल:
जिस संवत में सूर्य को मंत्री पद प्राप्त होता है। उस वर्ष राजाओं को भय अर्थात प्रशासकों में परस्पर विरोध एवं टकराव बढ़ता है। केंद्र व राज्य सरकारों में मतभेद रहेंगे, पृथ्वी पर धन-धान्य आदि सुख साधनों का प्रसार अधिक बढ़ेगा परंतु साथ ही कठोर सरकारी नीतियों व गतिविधियों चोर लुटेरों के कारण प्रजा में भय व संतोष बनेगा। गंभीर पेचीदा रोगों की अधिकता होगी, पेयजल, गुड़, दूध, तेल एवं फल सब्जियां, चीनी आदि रसदार वस्तुओं की कमी एवं उस में तेजी आएगी। अन्य जन उपयोगी वस्तुओं के भाव में भी तेजी होने की संभावना है।

3. सस्येश मंगल का फल:
सस्येश यानी चौमासा फलों का स्वामी मंगल होने से हाथी, घोड़े, गधे आदि चौपाइयों तथा गाय, बकरी, भैंस आदि दुधारू पशुओं में भी विचित्र प्रकार के रोग फैलने की आशंका रहेगी कहीं उपयुक्त वर्षा की कमी के कारण खड़ी फसलों जैसे धान व जौ, चना, गेहूं, सोयाबीन, सब्जियों आदि को नुकसान पहुंचेगा। फल स्वरुप इनके भागों में भी तेजी बनेगी।

4. धान्येश चंद्र का फल:
जिस वर्ष धान्य का स्वामी चंद्रमा हो उस वर्ष जनसंख्या में विशेष वृद्धि होती है। शीतकालीन फसलों जैसे धान्य, चावल, गन्ना, कपास, चना, सोयाबीन, सरसों आदि तथा गाय के दूध और घी के उत्पादन में विशेष वृद्धि होगी। श्रेष्ठ एवं उपयोगी वर्षा धरती पर नदियों तालाबों में जलस्तर ठीक रहेगा तथा लोगों में उत्साह बना रहेगा।

5. मेघेश शनि का फल:
मेघेश अर्थात वर्षा का स्वामी शनि हो तो पृथ्वी पर विरल वर्षा अर्थात वृष्टि हो अर्थात कहीं कम वर्षा और कहीं अतिवृष्टि के कारण बाढ़ आदि से जनधन में कृषि की हानि हो। राजकीय एवं प्रशासकीय नीतियों व नियमों के कारण लोगों के मन में क्षोभ एवं संताप रहे जनता कई प्रकार के रोगों से पीड़ित एवं परेशान भी रहे।

6. रसेश गुरु का फल:
यदि गुरु रसाधीपति हो तो वर्ष में विशिष्ट साधन संपन्न लोगों में भौतिक सुखों की विशेष वृद्धि होगी। घास, फल, फूलदार वृक्षों की पैदावार अच्छी होगी। जनसाधारण विद्वान ब्राह्मणों की सेवा सत्कार में तत्पर होंगे। परंतु किसी जनपद अथवा सीमावर्ती प्रांतों में शासक प्रशासक पुलिस सैन्य अधिकारी अपने वाहनों एवं शस्त्र गोलों की परेड व परीक्षण करेंगे।

7. नीरशेस मंगल का फल:
नीरशेस अर्थात धातुओं का स्वामी मंगल होने से माणिक्य, मूंगा, पुखराज, हीरे आदि रत्न, लाल वस्त्र, गर्म वस्त्र, लाल चंदन, सोना, पीतल, तांबा, लाख, खल, बिनोला आदि तथा अन्य लाल वर्ण के पदार्थ व धातु महंगे होंगे।

8. फलेश शनि का फल:
फलों का स्वामी शनि हो तो विभिन्न्न प्रकार के फलों की कृषि को हांज होगी। पुष्प आदि की पैदावार भी कम ही हो, पर्वतीय प्रदेशो में असमय हिमपात से हानि, चोरी, ठगी लूटमार बेईमानी की घटना हो गंभीर रोगों से लोग व्याकुल होंगे।

9. धनेश मंगल का फल:
जिस संवत्सर में धन (कोष) स्वामी मंगल होता है उस वर्ष व्यापारिक वस्तुओं के मूल्य में विशेष उतार चढ़ाव लगा रहता है। माघ मास में वर्षा ना होने अथवा बेमौसमी वर्षा होने से गेंहू व भूसे का कम उत्पादन होगा। सारे देश मे अनिश्चितता एवं अस्थिरता का वातावरण रहता है। शासन व प्रशासन भी जन विरोधी नीतियों का अनुपालन करता है।

10. दुर्गेश शनि का फल:
दुर्गेश अर्थात सेनापति शनि हो तो अनेक देशों में आंतरिक दंगो फसाद एवं युद्धमय वातावरण से आतंकित लोग अपना स्थान छोड़कर अन्यत्र पलायन करने के लिए विवश होते हैं। विभिन्न प्रांतों में समुदाय के लोगों में जातीय एवं सांप्रदायिक झगड़े फसाद एवं टकराव की घटनाएं अधिक होती है तथा वातावरण शांत रहता है। कहीं चूहों, विषाक्त कीटाणुओं, विभिन्न कीटों, अनावृष्टि, अतिवृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाओं से खड़ी फसलों को भारी हानि हो सकती है।

लाभ-हानि विवेक गणना सारणी:
अपनी राशि अनुसार लाभ खर्च दोनो अंको का जोड़ कर १ घटाए तथा ८ का भाग दें। यदि १ शेष रहे तो वर्ष में लाभ, २ में सुख शांति, ३ में क्लेश ४ में रोग-शोक, ५ में अपयश, ६ में मानद जीवन, ७ में विजय लाभ, तथा ८ या ० शेष रहने पर कुयोग जाने। इसमे विशेषकर अपनी जन्म/राशि/लग्न से गोचर दशा का चिंतन करना भी योग्य फल सूत्र समझना चाहिये।


राशि लाभ खर्च
मेष 02 08
वृष 11 14
मिथुन 14 11
कर्क 08 11
सिंह 11 05
कन्या 14 11
तुला 11 14
वृश्चिक 02 08
धनु 05 14
मकर 08 08
कुम्भ 08 08
मीन 05 15

परिधावी हिन्दू धर्म में मान्य संवत्सरों में से एक है। यह 60 संवत्सरों में छियालीसवाँ है। इस संवत्सर के आने पर विश्व में अन्न काफ़ी मंहगा होता है, वर्षा मध्यम होती है, प्राकृतिक उपद्रव होते रहते हैं और प्रजा कई प्रकार के रोगों से पीड़ित रहती है। इस संवत्सर का स्वामी इंद्राग्नी को कहा गया है। परिधावी संवत्सर में जन्म लेने वाला शिशु विद्वान, सुशील, कला में कुशल, श्रेष्ठ बुद्धि वाला, राजमान्य, भ्रमणशील प्रवृत्ति वाला और व्यापार में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होगा। ब्रह्माजी ने सृष्टि का आरम्भ चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से किया था, अतः नव संवत का प्रारम्भ भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। हिन्दू परंपरा में समस्त शुभ कार्यों के आरम्भ में संकल्प करते समय उस समय के संवत्सर का उच्चारण किया जाता है। संवत्सर 60 हैं। जब 60 संवत पूरे हो जाते हैं तो फिर पहले से संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।

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साभार : भारतकोश bhartdiscovery.org

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