पवित्र पितृ पक्ष आरंभ; जानें किस दिन कौन सा श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष में अपनाए जाने वाले सभी मुख्य नियम

13 सितम्बर 2019 शुक्रवार से महालय श्राद्ध आरम्भ
1) श्राद्ध के दिन भगवदगीता के सातवें अध्याय का माहात्मय पढ़कर फिर पूरे अध्याय का पाठ करना चाहिए एवं उसका फल मृतक आत्मा को अर्पण करना चाहिए।
2) श्राद्ध के आरम्भ और अंत में तीन बार निम्न मंत्र का जप करें l
मंत्र ध्यान से पढ़े
ll देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च l
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव भवन्त्युत ll
(समस्त देवताओं, पितरों, महायोगियों, स्वधा एवं स्वाहा सबको हम नमस्कार करते हैं l ये सब शाश्वत फल प्रदान करने वाले हैं l)
3) “श्राद्ध में एक विशेष मंत्र उच्चारण करने से, पितरों को संतुष्टि होती है और संतुष्ट पितर आप के कुल खानदान को आशीर्वाद देते हैं
मंत्र ध्यान से पढ़े
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा|
4) जिसका कोई पुत्र न हो, उसका श्राद्ध उसके दौहिक (पुत्री के पुत्र) कर सकते हैं l कोई भी न हो तो पत्नी ही अपने पति का बिना मंत्रोच्चारण के श्राद्ध कर सकती है l
5) पूजा के समय गंध रहित धूप प्रयोग करें और बिल्व फल प्रयोग न करें और केवल घी का धुआं भी न करें|

श्राद्ध में पालने योग्य नियम

श्रद्धा और मंत्र के मेल से पितरों की तृप्ति के निमित्त जो विधि होती है उसे ‘श्राद्ध’ कहते हैं।

हमारे जिन संबंधियों का देहावसान हो गया है, जिनको दूसरा शरीर नहीं मिला है वे पितृलोक में अथवा इधर-उधर विचरण करते हैं, उनके लिए पिण्डदान किया जाता है।

#बच्चों एवं संन्यासियों के लिए पिण्डदान नहीं किया जाता

विचारशील पुरुष को चाहिए कि जिस दिन श्राद्ध करना हो उससे एक दिन पूर्व ही संयमी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को निमंत्रण दे दे। परंतु श्राद्ध के दिन कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण घर पर पधारें तो उन्हें भी भोजन कराना चाहिए।

भोजन के लिए उपस्थित अन्न अत्यंत मधुर, भोजनकर्ता की इच्छा के अनुसार तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किया हुआ होना चाहिए। पात्रों में भोजन रखकर श्राद्धकर्ता को अत्यंत सुंदर एवं मधुर वाणी से कहना चाहिए कि ‘हे महानुभावो ! अब आप लोग अपनी इच्छा के अनुसार भोजन करें।’

श्रद्धायुक्त व्यक्तियों द्वारा नाम और गोत्र का उच्चारण करके दिया हुआ अन्न पितृगण को वे जैसे आहार के योग्य होते हैं वैसा ही होकर मिलता है। (विष्णु पुराणः 3.16,16)

श्राद्धकाल में शरीर, द्रव्य, स्त्री, भूमि, मन, मंत्र और ब्राह्मण-ये सात चीजें विशेष शुद्ध होनी चाहिए।

श्राद्ध में तीन बातों को ध्यान में रखना चाहिएः शुद्धि, अक्रोध और अत्वरा (जल्दबाजी नही करना)

श्राद्ध में मंत्र का बड़ा महत्त्व है। श्राद्ध में आपके द्वारा दी गयी वस्तु कितनी भी मूल्यवान क्यों न हो, लेकिन आपके द्वारा यदि मंत्र का उच्चारण ठीक न हो तो काम अस्त-व्यस्त हो जाता है। मंत्रोच्चारण शुद्ध होना चाहिए और जिसके निमित्त श्राद्ध करते हों उसके नाम का उच्चारण भी शुद्ध करना चाहिए।

जिनकी देहावसना-तिथि का पता नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन करना चाहिए।

हिन्दुओं में जब पत्नी संसार से जाती है तो पति को हाथ जोड़कर कहती हैः ‘मुझसे कुछ अपराध हो गया हो तो क्षमा करना और मेरी सदगति के लिए आप प्रार्थना करना।’ अगर पति जाता है तो हाथ जोड़ते हुए पत्नी से कहता हैः ‘जाने-अनजाने में तेरे साथ मैंने कभी कठोर व्यवहार किया हो तो तू मुझे क्षमा कर देना और मेरी सदगति के लिए प्रार्थना करना।’

हम एक दूसरे की सदगति के लिए जीते जी भी सोचते हैं, मरते समय भी सोचते हैं और मरने के बाद भी सोचते हैं।

महालय श्राद्ध आरम्भ

जो कर्म श्रद्धापूर्वक किया जाय उसे श्राद्ध कहते हैं । श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ।

भगवान सूर्य कहते हैं : जो व्यक्ति श्राद्ध नहीं करता, उसकी पूजा न तो मैं, न तो कोई देवता ग्रहण करते हैं । श्राद्ध न करनेवाला घोर तामिस्त्र नरक पाता है और अंत में सुकर योनि में उत्पन्न होता है ।

देवताओं को अन्न का भाग देने के लिए मंत्र के पीछे “स्वाहा” शब्द का और पितरों को भाग देने के लिए श्राद्ध में 3 बार “स्वधा”शब्द का उच्चारण करना चाहिए ।

श्राद्ध में 3 वस्तुएँ पवित्र मानी गई हैं

1⃣ तिल
2⃣ दौहित्र (पुत्री का पुत्र)
3⃣ कुतप (दिन के आठवे प्रहर में जब सूर्य का ताप घटने लगता है, उस समय को कुतप कहते हैं) । उसमें पितरों को दिया हुआ दान अक्षय होता है ।
गाय का दही, दूध, घी व शक्कर आदि से युक्त अन्न पितरों के लिए तृप्तिकारक होते हैं । शहद मिलाकार तैयार किया हुआ कोई भी पदार्थ तथा गाय का घी व दूध मिलाकर बनाई हुई खीर भी पितरों को दी जाय तो वह अक्षय होती है ।
पितरों को क्या प्रिय है और क्या अप्रिय
#प्रिय
कुश, उड़द, साठी चावल, जौ, गन्ना, मूंग, सफ़ेद फूल, शहद, गाय का दूध एवं घी ये वस्तुएँ पितरों को सदा प्रिय हैं अतः श्राद्ध में इनका उपयोग करें ।
#अप्रिय
मसूर, मटर, कमल, बिल्व, धतूरा, भेड़-बकरी का दूध इन वस्तुओं का उपयोग श्राद्ध में न करें ।

श्राद्ध सम्बन्धी बातें

श्राद्ध कर्म करते समय जो श्राद्ध का भोजन कराया जाता है, तो ११.३६ से १२.२४ तक उत्तम काल होता है l

गया, पुष्कर, प्रयाग और हरिद्वार में श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है l

गौशाला में, देवालय में और नदी तट पर श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना गया है l

सोना, चांदी, तांबा और कांसे के बर्तन में अथवा पलाश के पत्तल में भोजन करना-कराना अति उत्तम माना गया है l लोहा, मिटटी आदि के बर्तन काम में नहीं लाने चाहिए l

श्राद्ध के समय अक्रोध रहना, जल्दबाजी न करना और बड़े लोगों को या बहुत लोगों को श्राद्ध में सम्मिलित नहीं करना चाहिए, नहीं तो इधर-उधर ध्यान बंट जायेगा, तो जिनके प्रति श्राद्ध सद्भावना और सत उद्देश्य से जो श्राद्ध करना चाहिए, वो फिर दिखावे के उद्देश्य में सामान्य कर्म हो जाता है

सफ़ेद सुगन्धित पुष्प श्राद्ध कर्म में काम में लाने चाहिए l लाल, काले फूलों का त्याग करना चाहिए l अति मादक गंध वाले फूल अथवा सुगंध हीन फूल श्राद्ध कर्म में काम में नहीं लाये जाते हैं।

तिथिवार श्राद्ध: 

👉 *13 सितम्बर (शुक्रवार) पूर्णिमा श्राद्ध*
👉 *14सितम्बर (शनिवार) प्रतिपदा श्राद्ध*
👉 *15 सितम्बर (रविवार) द्वितीया श्राद्ध*
👉 *17 सितम्बर (मंगलवार) तृतीया श्राद्ध*
👉 *18 सितम्बर (बुधवार) महा भरणी, चतुर्थी श्राद्ध*
👉 *19 सितम्बर (बृहस्पतिवार) पञ्चमी श्राद्ध*
👉 *20 सितम्बर (शुक्रवार) षष्ठी श्राद्ध*
👉 *21 सितम्बर (शनिवार) सप्तमी श्राद्ध*
👉 *22 सितम्बर (रविवार) अष्टमी श्राद्ध*
👉 *23 सितम्बर(सोमवार) नवमी श्राद्ध*
👉 *24 सितम्बर (मंगलवार) दशमी श्राद्ध*
👉 *25 सितम्बर (बुधवार) एकादशी श्राद्ध, द्वादशी श्राद्ध*
👉 *26 सितम्बर (बृहस्पतिवार) मघा श्राद्ध, त्रयोदशी श्राद्ध
👉 27 सितम्बर (शुक्रवार) चतुर्दशी श्राद्ध
👉 28 सितम्बर (शनिवार) सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या

ज्योतिषाचार्य पं. नर्मदेश्वर शास्त्री, सम्पर्क: 8349165764/ 

 

आवेदन करें : सम्वाददाता / ब्यूरो चीफ


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