प्लेटफार्म पर हर रोज हो रही सैंकड़ों गैलन पानी की बर्बादी

झांसी . यह आश्चर्य जनक के साथ-साथ सत्य है कि भीषण गर्मी के कारण शहर की घनी आबादी के क्षेत्रों में पानी की त्राहि-त्राहि से आम जनता परेशान है, किन्तु झांंसी रेलवे स्टेशन ऐसा है जहां प्लेटफार्मों की धुलाई में सैंकड़ों गैलेन पेयजल प्रतिदिन बर्बाद किय जाता है। एक-एक बूंद पानी का संचय करने पर लम्बे-चौड़े भाषण देने वाले रेलवे अधिकारियों के सामने पानी की बर्बादी कथनी व करनी पर सवाल खड़े कर रही है।

गौरतलब है कि भीषण गर्मी के चलते बुन्देलखण्ड के नदी, तालाब, कुआं आदि जल स्त्रोत सूखने से पानी की त्राहि-त्राहि मची हुई है। ले-देकर बुन्देलखण्ड की गंगा बेतवा नदी का पानी प्यास बुझा रहा है, किन्तु पानी के दुरुपयोग से जल संकट गहराने की सम्भावनाएं बढ़ गयी हैं। स्थिति को देखते हुए जिला प्रशासन द्वारा पानी की मितव्यतता के आदेश जारी कर दिए हैं।

इसके चलते गाडिय़ों की धुलाई करने वाले सर्विस स्टेशनों को सख्ती से बंद कर दिया गया है। जनता को मानसून के आने का इंतजार है। जानकारों का कहना है कि यदि मानसून विलम्ब से आया तो जल संकट गहरा सकता है। इस स्थिति के बावजूद रेल प्रशासन को जल संकट की कोई परवाह नहीं है। पेयजल की बर्बादी का ज्वलंत प्रमाण झांसी स्टेशन है।

दरअसल, रेल प्रशासन द्वारा झांसी स्टेशन के आठों प्लेटफार्म की मैकनाइज्ड क्लीनिंग (साफ-सफाई) का ठेका लाखों रुपए में प्राइवेट कम्पनी को दिया गया है ताकि कम पानी में प्लेटफार्म आदि की सफाई नियमित रूप से हो, किन्तु जब से ठेका हुआ है तब से ठेकेदार के आदमियों द्वारा मशीनों का उपयोग कम, पानी का दुरुपयोग अधिक किया जा रहा है। हालत यह है कि प्लेटफार्म की सफाई के लिए कर्मचारियों द्वारा प्लेटफार्म पर स्थित पानी के स्टैण्ड पोस्ट के नल में दो इंच मोटे प्लास्टिक के पाइप को फंसा कर पानी की मोटी धार से आठों प्लेटफार्म की धुलाई की जाती है। यह धुलाई नियमित रूप से दिन में कम से कम दो बार की जाती है।

पानी की इस तरह से बर्बादी देख कर यात्री ही नहीं कर्मचारी भी रेल प्रशासन की इस कुव्यवस्था को देख कर चिन्तित रहते हैं जबकि जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी परवाह नहीं है, उन्हें तो प्लेटफार्म चकाचक दिखाई देना चाहिए क्योंकि उच्चाधिकारियों केनिरीक्षण में नम्बर नहीं कटना चाहिए।

आपको बता दें कि जिस पानी का धुलाई के लिए प्रयोग किया जाता है वह बेतवा नदी के नोटघाट अथवा रेलवे क्षेत्र के कुओं से रेलवे की टंकियों में सप्लाई होता है। इन टंकियों से धुलाई के लिए सैंकड़ों गैलेन पानी प्रतिदिन लेकर बर्बाद किया जाता है। इसके इतर सीपरी बाजार, शहर, प्रेमनगर के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पानी की समस्या सुरसा की तरह मुंह फाड़ रही है और रेल प्रशासन प्लेटफार्म की चमक में खोया है। मण्डल रेल प्रबन्धक को प्लेटफार्म पर बर्बाद किए जा रहे पेयजल पर रोक लगाने के निर्देश जारी करना चाहिए ताकि पानी का सदुपयोग हो सके। रेल मंत्री का भी इस ओर ध्यान आपेक्षित है।

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