अपने ही गुरुओं को चित कर चेला बने विजेता

चुनाव के दरमियान हार और जीत का खेल लाजिमी है क्योंकि कभी हिन्दुस्तान की वर्षों आवाज रही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और देश का स्वाभिमान रहे पन्डित अटल बिहारी बाजपेई भी चुनावी दंगल में चित्त हो गये थे।

इस दफा भी लोकसभा के आम चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी परिवार की परंपरागत अमेठी से हार गये तो फिल्मों के रुपहले पर्दे पर सब को ‘खामोश’ कर देने वाले शत्रुघन सिन्हा अपने मित्र भारतीय जनता पार्टी के रविशंकर प्रसाद से पटना साहिब से शिकार हो गये। इसके अलावा भी सभी दलों के कई दिग्गज इस चुनावी भीषण युद्ध में कहीं  कोई मित्र के साथ तो कहीं राजनीतिक शत्रु के हाथों खेत रहे।

मगर सबसे ज्यादा चोकानें वाले परिणाम झाड़खंड की ‘दुमका’ और मप्र की ‘शिवपुरी-गुना’ लोकसभा क्षेत्र से आये, जहां देश के आदिवासियों के सबसे बड़े नेता और दिग्गज शिबू सोरेन और मप्र के बड़े कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने ही शिष्यों के हाथों लोकसभा समर 2019 में मैदान हार गये और कल तक शिबू सोरेन और ज्योतिरादित्य सिंधिया के क्रमश: अत्यंत निकट समर्थक और शिष्य रहे सुनिल सोरेन और डाक्टर कृष्णपाल सिंह यादव बाजी फतह करने में कामयाब रहे

उल्लेखनीय है कि शिबू सोरेन और ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार पर देश और दुनिया के लोग हैरान हैं और आश्चर्यचकित हैं। आठ दफा के सांसद और तीन दफा झाड़खंड के मुख्यमंत्री व पूर्व केन्द्रीय मंत्री रहे शिबू सोरेन को पूरे झाड़खंड के बेहद लोकप्रियता प्राप्त है जबकि दुमका लोकसभा क्षेत्र तो गुरुजी शिबू सोरेन को बच्चा-बच्चा जानता है, बावजूद उन्हें भारी पराजय का सामना करना पड़ा।

बताते हैं कि शिबू सोरेन गुरुजी को हराने वाले सुनिल सोरेन उनके पुत्र दुर्गा सोरेन को अपना गुरु मानते हैं और उन्हें महागुरु। मगर गत चुनाव 2014 में शिबू सोरेन से अलग होकर सुनिल सोरेन ने भाजपा के टिकट पर ‘दुमका’ से गुरुजी को ललकारा मगर गुरुजी ने सुनिल को करीब चार वोटों से पटकनी दे दी। मगर इसके बाद हुये प्रदेश विधानसभा के चुनाव में सुनील ने अपने गुरु दुर्गा सोरेन को पटकनी देकर विधायकी झटकी और अब महागुरु को लगभग 47000 मतों से पटकनी देकर सांसदी पर कब्जा जमा लिया।

इधर कांग्रेसी दिग्गज पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया को उनके ही खास सिपहसालार डाॅक्टर कृष्णपाल सिंह यादव ने सवा लाख के बड़े अन्तर से पराजित कर दिया। यहां यह उल्लेखनीय है कि मुंगावली उप चुनाव से पहले शिवपुरी-गुना संसदीय क्षेत्र की लगभग दो हजार दीवालों पर ‘अबकी बार प्रदेश में सिंधिया सरकार’ लिखवा चुके यादव ही महाराज की हार का प्रमाण बने।

दोनों दिग्गजों की हार का सबसे बड़ा कारण जनता से दूरी और चापलूसों से घिरा होना रहा। हालांकि इन दोनों की हार के दूरगामी परिणाम तय हैं, जो समय के साथ अपना असर दिखायेंगे।मगर फिलहाल हम कह सकते हैं कि इन दिग्गजों ने अपने शिष्यों के सामने इस भीषण चुनावी रण में हथियार डाल दिये  

@श्रीगोपाल गुप्ता, स्वतंत्र लेखक हैं और यह लेखक के निजी विचार हैं.

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