आज EVM के साथ एक्जिट पोल की भी खुलेगी पोल, जानिए कैसे

गत दिनों हुए मतदान की गणना गुरुवार की सुबह शुरू होगी. रुझान दोपहर या दोपहर बाद मिलना शुरू हो जावेंगे. लेकिन परिणाम देर शाम या रात से ही मिलना शुरू हो सकेंगे. यह भी संभव है कि, सभी यानि लोकसभा की 542 सीटों के लिए हुए मतदान के परिणाम शुक्रवार सुबह तक मिल सकें, मालूम हो कि एक सीट के लिए चुनाव नहीं हो सका.

आज जब ईवीएम खुलेंगीं तो कई राजनीतिक दलों व नेताओं की किस्मत भी खुलेगी. इसके साथ ही एक चीज और खुलेगी, वह है- एक्जिट पोल की पोल. तब हमें ऐसा लगेगा कि, सरकारी ढोल फट गया और उसकी पोल खुल गई.

सरकार किसकी बनेगी- भाजपानीत राजग की, कांग्रेसनीत संप्रग की या तीसरे महागठबंधन की. यहां उल्लेखनीय है कि, संप्रग व महागठबंधन परिणाम आने के बाद मिलाप कर सकते हैं.

सरकार किसकी बनेगी, यह अलग बात है. पीएम मोदी ही होंगे या कोई और, यह भी अलग बात है. मैं तो केवल यह बताना चाहता हूं कि, एक्जिट पोल पूरी तरह झूठे हैं, निराधार हैं. दरअसल, यह केवल एक मजबूरी के तहत तैयार होते हैं. ज्यादातर माना यही जाता है कि, जिसकी सत्ता है, जिसके पास ताकत है, उसी के पक्ष में तैयार किए जाते हैं.

यदि ऐसा न होता तो एक ही पक्ष के दो एक्जिट पोल में सौ सीटों का अंतर न होता. आपने देखा होगा कि एक एक्जिट पोल भाजपा को ढाइसौ सीटें मिलना बता रहा तो दूसरा साढ़े तीन सौ. स्पष्टत: अगर ये सही होते तो दोनों की सीटें बराबर होना चाहिए थीं,

ऐसा क्यों होता है:

दरअसल होता यह है कि, किसी भी बड़े मीडिया संस्थान (अखबार या चैनल) का मालिक पत्रकार नहीं होता, व्यापारी होता है. जो हर काम आर्थिक लाभ के लिए करता है. उसके सामने तमाम तरह के खर्चे होते हैं जिनकी पूर्ति के लिए वह सरकार से मिलने वाले विज्ञापन पर आश्रित होता है. कुछ सरकारें तब ही सहयोग करती हैं जब उनके मनमाफिक खबरें दी जावें या ‘पोल’ किए दावें.

समझा जा सकता है कि ऐसी हालत में मीडिया संस्थान मीडिया न होकर सरकारी भौंपू मात्र बनकर रह जाता है, अन्यथा उसका दमन होने लगता है. सरकारें अपराधियों, आतंकवादियों व विरोधी दलों से भी ज्यादा मीडिया पर कहर बरपाना शुरू कर देती हैं. तब उस संस्थान के मालिकों के अलावा पत्रकारों व अन्य कर्मचारियों के घरों तक आर्थिक संकट पहुंचने लगता है.

इसके विपरीत कुथ पत्रकार ऐसे भी होते हैं जो स्वयं ही बिना किसी मजबूरी के हमेशा सत्ता के साथ रहना पसंद करते हैं. नाम लिखने या बताने की जरूरत नहीं. हर छोटे – बड़े शहर में ऐसे पत्रकार आपने देखे होंगे, जिनका वेतन तो हजारों में ही होता है, लेकिन उनके खर्चे, रहन सहन और गाड़ी बंगला किसी धनाढ्य से कम नहीं होते.

इन तथ्यों से आप समझ सकते हैं कि, एक्जिट पोल में हमेशा ही बड़ी पोल होती है. ये सच कभी नहीं दिखा सकते. यह इनको तैयार करने वालों की मजबूरी रहती है.
प्रसंगवश : @राकेश पाठक

मित्रों, वाट्सएप पर खबरें खबरें पढ़ने के लिए स्क्रीन पर दिख रहे वाट्सएप के निशान पर क्लिक करें. अगर तत्काल ताजा खबरें चाहें तो फॉलो करें या लाल घंटी बजाकर Subscribe करें. आप हमारा नम्बर 9993069079 अपने वाट्सएप ग्रुप में भी जोड़ सकते हैं. नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय भी दे सकते हैं, आपका नाम, नम्बर, ईमेल शो नहीं किया जावेगा. यह सब बिलकुल मुफ्त है.

loading...