नमन; शिक्षा जगत में राजीव के सपने

21 मई पुण्य-तिथि पर विशेष -जीतू पटवारी

इन दिनों एक बहुचर्चित विचार समाज में गूँज रहा है ‘जागरूकता ही राष्ट्र-भक्ति है।’ इसके अन्दर छिपा हुआ सत्य, परस्पर दो आयाम के रिश्तों पर खड़ा हुआ है। यानी एक ताना है और दूसरा बाना है। ताना जहाँ मानवीय संसाधन है, वहीं बाना प्राकृतिक संसाधन है। ताना और बाना मिलकर ही राष्ट्र की चादर बुनते हैं। जागरूकता इसकी रक्षा करती है। यानी राष्ट्र की मानवीय सम्पदा की और प्राकृतिक सम्पदा की रक्षा जागरूकता से ही होती है।

यहाँ पर ‘शिक्षा’ जागरूकता के औजार की धार को पैना करती है। इस विश्वास को स्थापित करने का काम शिक्षा से ही संभव है। अर्थात शिक्षा वह है जो विश्वास पैदा करे। इस भरोसे को स्थापित करने का काम रीति और नीतियाँ ही करती हैं।

जीतू पटवारी


इसलिए महत्वपूर्ण यह है कि राजीव गांधी ने 1986 में राष्ट्र की शिक्षा नीति का निर्माण किया, जिसमें मानवीय संसाधन और प्राकृतिक संसाधनों के समन्वय से एक शिक्षा नीति को एक सूत्र में पिरोया गया।


बहुद्देश्यीय शिक्षा नीति को राजीव गांधी के नेतृत्व में भारतीय संसद ने वर्ष 1986 में अंगीकार किया था। इसकी सिफारिशों की रोशनी में वैज्ञानिक सैम पित्रोदा के निर्देशन में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा कार्य-योजना बनाई गई। इस प्रकार वह आधार-शिला तैयार हुई जिस पर चलते हुए केन्द्र तथा विभिन्न राज्य की सरकारों द्वारा शैक्षणिक विकास के विविध उपाय सुझाये गये। लेकिन वर्तमान परिवेश में जिस प्रकार का अविश्वास शिक्षा में आया है वह दुःखद है। आरोप-प्रत्यारोप और निंदा नये रूप में परिभाषित होने लगे हैं, जो शक्ति नव-निर्माण में लगनी चाहिये थी, वह पारस्परिक स्पर्धा और कलह में नष्ट हो रही है।

अतः आज आँच पैदा करने वाली शिक्षा नहीं बल्कि राजीव जी की परिभाषित प्रकाशदाता शिक्षा नीति की आवश्यकता है। ग्रामीण विश्वविद्यालय, महिला विश्वविद्यालय, मुक्त विश्वविद्यालय, दूरस्थ शिक्षा, स्वायत्त महाविद्यालय, एकेडेमिक स्टाफ कॉलेज, नवोदय विद्यालय, शिक्षा उपकार, शिक्षा का अधिकार, विभिन्न छात्रवृत्तियाँ, सेमेस्टर प्रणाली, सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड, नेशनल असेसमेंट एण्ड एक्रीडेशन काउंसिल, राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा), स्व-रोज़गार को बढ़ावा, उद्यमिता तथा पर्यावरण चेतना का पाठ्यक्रमों में समावेश इत्यादि इसके प्रमुख अवदान हैं। ये कार्य अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में अवश्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं, परंतु अभी हम उस स्वप्न से बहुत दूर हैं, जिसे आँखों में बसाकर राजीव गांधी ने जनवरी 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्माण की पहल की थी। उन्होंने कहा था कि हमारा देश आर्थिक और तकनीकी विकास के एक ऐसे स्तर को पा चुका है जिस पर हम शिक्षा के माध्यम से अब तक अर्जित सम्पदा का अधिकतम लाभ लेने और इस परिवर्तन का लाभ सभी तक पहुँचाने के लिए बड़े प्रयास करें।


दरअसल, राजीव गांधी को शिक्षा के सामर्थ्य पर अटूट विश्वास था। वे मानते थे कि शिक्षा द्वारा संसाधनों के परस्पर रिश्ते स्थापित किये जा सकते हैं, जिन पर चलकर ही देश आर्थिक तथा सामाजिक विकास करते हुए एक संवेदनशील तथा जिम्मेदार नागरिक और समतामूलक समाज की स्थापना कर सकता है। उन्हें शिक्षा के माध्यम से भारत की नई पीढ़ी से बहुत उम्मीद थी इसलिए इस शिक्षा नीति में बहुत ऊँचे लक्ष्य रखे गए थे और इसी अनुपात में शिक्षा पर जीडीपी के 6 प्रतिशत तक व्यय करने की सिफारिश भी की गई थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के बावजूद हमारी सरकारें जीडीपी का लगभग 3-4 प्रतिशत ही शिक्षा पर व्यय करती हैं। इस प्रकार वित्त की कमी इस नीति के क्रियान्वयन में एक बड़ी बाधा रही है। इस बाधा को दूर करने के लिये सरकारों को बजट आवंटन में इसका ध्यान रखने की बहुत जरूरत है।


राष्ट्रीय शिक्षा नीति की पृष्ठभूमि में एक वजह यह भी थी कि श्री राजीव गांधी देश में दूरसंचार क्रांति ला रहे थे तथा देश को कोटा, परमिट तथा लाइसेंस के राज्य से निकालकर उदारीकरण की नई दुनिया में ले जा रहे थे। इसके लिए देश को शिक्षित तथा कुशल युवाओं की आवश्यकता थी। इन नवीन आवश्यकताओं के संदर्भ में ही राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की स्थापना की गई थी। श्री गांधी द्वारा बनवायी गयी शिक्षा नीति में न केवल देश की जरूरतों, बल्कि व्यक्ति की अभिरुचि और इसकी स्थानीय आवश्यकताओं का भी ध्यान रखा गया है। इस प्रकार यह नीति देश तथा स्थानीय जरूरतों के अनुसार मानव संसाधन तैयार करने का तरीका भी सुझाती है और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति दायित्व-बोध भी कराती है।
राजीव गांधी की राष्ट्रीय शिक्षा नीति समावेशी विकास के प्रति समर्पित तथा व्यावहारिक एवं परिणामोन्मुखी है। इसमें किए गए प्रयासों को प्राप्त परिणामों के आधार पर नापा जाता है तथा प्रत्येक परिणाम को विभिन्न वर्ग जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, आर्थिक रूप से कमजोर, दिव्यांग, महिला इत्यादि में विभाजित कर समावेशी विकास को सुनिश्चित किया जाता है। यह नीति सरकार, समाज, शिक्षक, पालक, विद्यार्थी तथा उद्योग को स्टेक होल्डर के रूप में मान्यता देती है।


यह नीति साहसिक भी कही जा सकती है, क्योंकि इसमें शिक्षा के माध्यम से युवाओं की रोजगार आवश्यकताओं को साहसपूर्वक स्वीकार किया गया है, यहाँ तक कि कुछ क्षेत्रों में रोजगार को विश्वविद्यालयीन डिग्री से पृथक गतिविधि के रूप में संचालित करने की बात कही गई है। इसके लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है। आज उच्च शिक्षा जगत में कैरियर मेला, प्लेसमेंट सेल, रोजगार मार्गदर्शन, व्यावसायिक पाठ्यक्रम, कौशल विकास के सर्टिफिकेट कोर्सेस इसी नीति की संकल्पनाओं का साकार रूप हैं।


इस शिक्षा नीति में इस बात पर बल दिया गया है कि विद्यार्थी धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद तथा प्रजातंत्र के वे मूल्य सीखें जो संविधान में वर्णित हैं। वे एन.सी.सी. तथा एन.एस.एस. के माध्यम से शिक्षा का विस्तार करें। इसी संदर्भ में इस नीति के अंतर्गत नेशनल सर्विस वालेन्टियर स्कीम का भी प्रावधान किया गया है, जो जागरूकता और राष्ट्र-भक्ति का समन्वय है।


आज राष्ट्र इस शिक्षा नीति के इन्द्रधनुषी स्वरूप की पड़ताल कर रहा है। वह यह भी चाह रहा है कि उसकी संवेदनाएँ, भीतर से जागरूक और निर्भीक युवा पीढ़ी के हाथों में रहे, जो सही रीति और नीति से निर्धारित होगी। राजीव जी के 75वें प्रसंग वर्ष पर यह कहना और विचारणा समीचीन होगा कि प्रौद्योगिकी की नव-संकल्पना, पंचायती-राज से लेकर मताधिकार, विज्ञान तकनीकी और कम्प्यूटर युग से ज्ञान की खुलती हुई तमाम खिड़कियों से आ रही ताजी हवा से नवयुवकों को रू-ब-रू कराना ही सच्चे अर्थों में श्री गांधी की स्मृति को चिर-स्थायी रखना है। यह स्मरण इसलिये भी जरूरी है कि युवा पीढ़ी ही आधुनिक भारत के निर्माण की अवधारणा के साँचे में खूबसूरत रंग भरेगी और भविष्य के भारत के बुनियादी ताने-बाने की रक्षा करेगी। आधुनिक और नये भारत के निर्माण के लिये शिक्षा संबंधी श्री राजीव गांधी के विचार, प्रेरणा के द्वार खोलते हैं। हमारे संसाधनों की मजबूती के लिए और हमारी शिक्षा की भूमिका के प्रति विश्वास पैदा करते हैं। आज राजीव गांधी की वैचारिक वापसी जरूरी है। उनके त्याग और बलिदान को राष्ट्र कृतज्ञतापूर्वक याद करता है और आने वाले वर्षों में याद करता रहेगा।

– लेखक मध्य प्रदेश खेल व शिक्षा मंत्री हैं

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