कौन होगा नया पीएम; राहुल नहीं, मोदी-शाह ने तय किया यह नाम?

2014 में चुनाव के दौरान मोदी लहर चली थी. भाजपा प्रमुख विपक्षी दल था. दूसरे दलों के नेता भाजपाई बने थे. तब भाजपा और उसके सभी सहयोगी दलों के नेताओं मोदी के नाम पर वोट मांगे थे. लेकिन इस चुनाव में स्थिति एकदम उलट है. भाजपा सत्ताधारी है तो भी मोदी लहर क्या, उसके पक्ष में हवा भी नहीं रह सकी. कई नेता पार्टी छोड़ गए, तो कई सहयोगी दल भी साथ छोड़ गए. मोदी खुद ही हर जगह जाकर कहते रहे कि, आप भाजपा का बटन दबाऐं तो वोट मोदी के खाते में पहुंचेगा. यानि वह अब भी खुद को पांच साल पुरानी हालत में मानकर चल रहे हैं.

इस चुनावी माहौल में जहां कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं था लेकिन भाजपा के पास बहुत कुछ था- सत्ता और पांच साल पहले जनता को दिया विश्वास. विश्वास तो भाजपा बल्कि नरेन्द्र मोदी ने सत्ता हासिल करते ही तोड़ दिया था. चुनाव में किए वादों को जुमला कहकर. इसके बाद स्मृति ईरानी, अरुण जेटली बगैरह आधा दर्जन चुनाव हारे नेताओं को मंत्री बनाकर यानि, जनादेश का मजाक बनाकर भी गलत संदेश दियी- हारे हुओं को ही साथ रखना था तो मतदान का मतलब ही क्या?

बेरोजगारी, महंगाई, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ आदि ढेरों समस्याओं को दरकिनार कर सरकार (खासकर पीएम नरेन्द्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह) एक ही ध्येय सामने आया- अश्वमेघ यज्ञ. उन राज्यों में भाजपा सरकार बनाना, जहां कांग्रेस या किसी अन्य की रही. इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली.

लेकिन इसके पीछे उनका जो मुख्य उद्देश्य था- कांग्रेस मुक्त भारत. उसमें परिणाम उलटा हो गया. दरअसल, मोदी – शाह सहित भाजपा के अन्य प्रमुख नेताओं ने एक बड़ी गलती कर दी. राजनीति में नए, जीवन में भी किशोरावस्था के राहुल गांधी को निशाना बना बैठे. पप्पू कहकर ही नहीं, अन्य तरह से भी उनको मजाक बनाते, पूरे पांच साल यही करते रहे. भूल गए पत्थर पर चोटें पड़ने से वह मूर्ति का आकार ले सकता है. इन पांच सालों में राहुल गांधी में जो परिपक्वता आई है, जो निखार दिखाई दिया है उसका बहुत कुछ श्रेय मोदी – शाह की इन चोटों का भी माना जाना चाहिए.

राहुल गांधी अब काफी परिपक्व हो चुके हैं, कांग्रेस नेता चाहते हों फिर भी वह अभी पीएम पद की दौड़ में नहीं दिखते. इसके दो कारण हैं- एक तो वह जानते हैं कि, कांग्रेस की सीटें बढ़ेंगी लेकिन इतनी नहीं कि, अकेले सरकार बन सके, दूसरा लालच से भी दूर हैं अन्यथा दो बार मौका मिलने पर गैर राजनीतिज्ञ डॉ मनमोहन सिंह कैसे बनते, सोनियां गांधी खुद न पीएम की कुर्सी पर बैठतीं.

इन सबसे भी मुख्य बात यह कि, राहुल गांधी का उद्देश्य भाजपा (बल्कि मोदी) को कुर्सी से दूर करना है, इसके लिए वह किसी भी गैर भाजपाई नेता या दल को समर्थन दे सकते हैं, जैसे कर्नाटक में किया था.

अब सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर कौन पीएम बन सकता है? तो मेरा विचार है कि, ऐसी हालत में सर्वाधिक संभावना पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी की होगी. इसके अलावा चंद्रबाबू नायडू, मायावती, अखिलेश यादव जैसे नाम भी सामने आ सकते हैं लेकिन हाल ही के दिनों में मोदी – शाह की जोड़ी ने जिस तरह ममता बनर्जी को टारगेट किया है, उससे प्रतीत होता है कि, मौजूदा सरकार को सर्वाधिक चुनौती ममता बनर्जी से ही मिल रही है, उनसे ही सरकार ज्यादा भयभीत दिख रही है.

जिस तरह पिछले पांच सालों में टारगेट पर लेकर भाजपा सरकार ने राहुल गांधी को परिपक्व राजनीतिक बना दिया है, ठीक उसी तरह अब ममता बनर्जी को टारगेट कर मोदी – शाह ने उनके लिए दिल्ली दरबार का रास्ता खोल दिया है.
@राकेश पाठक

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