MP; सालों से दबाए है सरकार लोकायुक्त की मांग, 300 से ज्यादा भ्रष्टों की नहीं हो पा रही जांच

मध्य प्रदेश में पिछले सालों में लोकायुक्त द्वारा जिन अधिकारियों व कर्मचारियों को घूस लेते पकड़ा गया या जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार की अन्य शिकायतें दर्ज कीं, उनकी जांच के लिए सम्बंधित विभागों से लोकायुक्त को जांच की अनुमति नहीं दी गई, लगभग सभी आरोपियों की फाइलें सरकार ने दबा रखी हैं. अब सरकार बदलने के बाद यह मामले फिर खबरों में आए हैं. संभव है कि, लोकसभा चुनाव बाद मौजूदा सरकार अनुमति जारी कर दे.

भोपाल . राजधानी स्थित मंत्रालयों में बैठे विभाग प्रमुख नौकरशाह प्रदेश के विभिन्न विभागों के 300 से ज्यादा भ्रष्ट अधिकारियों को खुला संरक्षण दे रहे हैं। शिकायतों के बाद लोकायुक्त संगठन ने जांच में इन अधिकारियों कर्मचारियों को प्रथम दृष्टया दोषी माना है और न्यायालय में प्रकरण दाखिल करने के लिए विभाग प्रमुखों की अनुमति मांगी है किंतु वर्षों बाद भी अभियोजन की अनुमति नहीं मिली है।

ऐसी दशा में भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे सैकड़ों सरकारी कर्मचारी अधिकारी अभी भी बिना कोई कार्यवाही के बेखौफ हो कर काम कर रहे हैं। लोकायुक्त ने इन अधिकारियों के खिलाफ आईं शिकायतों की जांच की। जांच में भ्रष्टाचार होना पाया गया। लोकायुक्त ने दोषी अधिकारी को खोजा और उसके खिलाफ सबूत जमा किए।

नियमानुसार विभाग के प्रमुख नौकरशाह के पास औपचारिक अनुमति के लिए मामला भेजा गया ताकि कोर्ट में चालान पेश किया जा सके परंतु नौकरशाहों ने अब तक अभियोजन की अनुमति ही नहीं दी है। कई मामले को तो लंबा लटकाया जा रहा है जबकि नियम है कि 3 माह के भीतर अनुमति देनी ही होगी। अब तो इस नियम की सार्थकता पर भी प्रश्नचिन्ह उठाए जा रहे हैं।

संसद ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में संशोधन करके अभियोजन स्वीकृति के लिए तीन महीने का समय सीमा निर्धारित किया है। इसके बावजूद इसका पालन शासन के विभागों द्वारा सुनिश्चित नहीं किया जा रहा है। सैकड़ों प्रकरण विभाग अध्यक्षों के पास अनिर्णय की स्थिति में अटका हुआ है।

इस संबंध में समय-समय पर पत्र लिखकर अवगत भी कराया जाता है, लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती है. मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन द्वारा राज्य शासन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया गया है साथ ही अनुरोध किया गया है इस ओर अविलंब ध्यान दें ताकि भ्रष्टाचारियों को बचाने का प्रयास बंद किया जा सके।

यह भी जानकारी मिली है कि अभियोजन की स्वीकृति के लिए लंबित प्रकरणों के निराकरण हेतु सरकार इसकी समीक्षा भी कभी नहीं करती. यही नहीं सरकार और उसके नुमाइंदे लोकायुक्त जैसे संगठन को गंभीरता से ही नहीं लेते ऐसी दशा में उनके द्वारा जारी पत्र और नोटिस को किनारे धूल की खाती हुई फाइलों में रख दिया जाता है।

शिकायतकर्ता अपनी शिकायतों के निराकरण की स्थिति के बारे में लोकायुक्त से जानकारी लेते हैं तो यही जानकारी मिलती है की जांच में आपकी शिकायत तो सही पाई गई है और दोषी के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति के लिए विभाग प्रमुख को लिखा गया है और स्वीकृति आने का इंतजार किया जा रहा है उसके बाद ही प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकेगा। ताकि पब्लिक इश्यू बने।

मिली जानकारी के अनुसार राजस्व, सामान्य प्रशासन विभाग, पंचायत ग्रामीण विकास विभाग और नगरीय प्रशासन एवं पर्यावरण विकास विभाग में क्रमश: 75, 47, 32 एवं 20 मामले अभियोजन स्वीकृति के लिए तीन माह से अधिक समय से लंबित हैं. अन्य विभागों को मिलाकर इस तरह कुल 309 मामले विभाग प्रमुख के पास लंबित हैं, जिनमें अभियोजन की स्वीकृति प्रदान की जानी है. विभाग प्रमुखों द्वारा अनुमति नहीं देने का कोई स्पष्ट कारण भी नहीं बताया जाता है इससे लोकायुक्त जैसी संस्थाओं की स्थापना पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

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