कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा बना दिग्गी राजा का भोपाल चुनाव

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देश भर की निगाहें इस समय भोपाल पर लगी हुई हैं। रविवार को मतदान से पहले भोपाल का लोकसभा चुनाव बहुत ही दिलचस्प मोड़ पर आ पहुंचा है। दिग्विजय सिंह की धर्म पत्नी अमृता सिंह ने भोपाल के मतदाताओं के नाम एक पत्र लिखकर बताया कि शादी के बाद दिग्गी राजा ने एक ही बात कही थी कि इस घर के दरवाजे किसी के लिए बंद नहीं होते हैं। यहां से कोई निराश नहीं जाना चाहिए।

अमृता सिंह के पत्र में लिखी यह बात ही दिग्विजय की राजनीति का मूल आधार है। राजनीति में ऐसे कम लोग बचे हैं जो मना करना नहीं जानते। दिग्विजय की ख्याति या उनके नाम से होने वाले विवाद सबका बेसिक कारण यही है कि दिग्गी राजा इधर उधर की बात करने के बदले तत्काल फैसला करते हैं।

इस चुनाव में दिग्विजय सिंह ने विजन भोपाल पेश करके लोगों के सामने भोपाल के विकास की एक तस्वीर खींच दी है तो दूसरी तरफ भाजपा उम्मीदवार और आतंकवाद के आरोपों से घिरी प्रज्ञा सिंह ने खुद को ही मुद्दा बना रखा है।
भोपाल जो 1947 में भी नफरत की आग से बचा रहा था आज फिर एक बड़े इम्तहान में है कि क्या यहां मेल मिलाप और भाईचारे की उत्कृष्ट परपंरा कायम रहेगी या शहर विभाजन की खाइयों में बंट जाएगा।

सवाल कांग्रेस और जनता में ही नहीं भाजपा में भी हैं। भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री साध्वी उमा भारती का यह दर्द भोपाल के लोगों के दिल में गहरे उतर गया है कि महान तो साध्वी प्रज्ञा हैं हम तो मूर्ख हैं।

भोपाल के ही नहीं मध्य प्रदेश के लोग उमा भारती का एक संघर्षशील नेता के रूप में सम्मान करते हैं जिन्होंने 2003 में कांग्रेस की सत्ता पलटी। और फिर मुद्दों के उपर भाजपा के उस समय के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी के मुंह पर उन्हें चुनौति दी फिर अलग पार्टी बनाकर उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से टकराईं।

उमा भारती में भी अन्य नेताओं की तरह गुण दोष दोनों हैं मगर मुद्दों के उपर उनके स्पष्टवादी, निर्भीक विचार उन्हें एक अलग आभा मंडल देते हैं। बीजेपी में राम के साथ रोटी की बात वह अकेले करती हैं तो दूसरी तरफ हनुमान जी के साथ वे महान क्रांतिकारी चे ग्वेरा से प्रेरणा लेने की बात करती हैं। ऐसी जुझारू जो भाजपा की पहली साध्वी नेता भी हैं अगर प्रज्ञा सिंह के सामने खुद को तिरस्कृत महसूस करें और खुद पर ही व्यंग्य करके कहें कि हम तो मूर्ख ही रह गए महान तो वह बन गईं तो यह भोपाल में भाजपा के लिए अच्छी बात साबित नहीं हुई।

भोपाल का चुनाव इतना दिलचस्प होगा यह किसी ने सोचा नहीं था। यहां पिछले तीन दशक से भाजपा जीत रही थी मगर चुनाव इतने हाई वोल्टेज पर जाएगा यह किसी ने सोचा नहीं था। हालांकि भोपाल का चुनाव कांग्रेस के लिए तो वरदान बन गया क्योंकि यहां का बीड़ा दिग्विजय सिंह द्वारा उठाने के बाद पूरे मध्य प्रदेश में पार्टी कार्यकर्ता जोश से भर गए। इन लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मध्य प्रदेश से बहुत उम्मीदें हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उन तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान से ज्यादा से ज्यादा सीटें चाहते हैं जहां से अभी विधानसभा में उन्होंने जीत हासिल की
है। तीन राज्यों में सबसे ज्यादा सीटें 29 मध्य प्रदेश में ही हैं। यहां मुख्यमंत्री बने कमलनाथ के लिए यह कठिन चुनौति थी कि भाजपा के परंपराग राज्य से राहुल गांधी को ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर दें। उनकी समस्या को आसान किया पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने। राज्य की सबसे कठिन सीट भोपाल से चुनाव लड़ने का बीड़ा उठाकर। हालांकि दिग्विजय राज्यसभा के सदस्य हैं और लोकसभा लड़ने की फिलहाल उन्हें कोई राजनीतिक जरूरत नहीं थी।

मगर चुनौति स्वीकार करने के लिए हमेशा तत्पर रहने वाले दिग्गी राजा ने कांग्रेस के इस मुश्किल समय में खुद आगे बढ़कर बीड़ा उठाया। इसका फायदा यह हुआ कि पूरे राज्य के कांग्रेसियों में उत्साह की एक लहर फैल गई। भोपाल से लगे इन्दौर में भी जहां भाजपा मजबूत मानी जाती थी दबाव में आ गई। इन्दौर में दिग्गी इम्पैक्ट यह हुआ कि वहां भी तीन दशक में पहली बार मुकाबला बराबारी पर आ गया जो इससे पहले भाजमा की तरफ झुका हुआ माना जाता था। इन्दौर में मोदी और प्रियंका दोनों को आना पड़ रहा है। ऐसा ही राज्य के तीसरे महानगर जबलपुर में हुआ। वहां भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को कांग्रेस के लीगल डिपार्टमेंट के चैयरमेन विवेक तनखा कड़ी टक्कर दी।

दरअसल 15 साल के शासन में भाजपा की जड़ें मध्य प्रदेश में और गहरी हो गईं। वैसे ही राज्य में हमेशा से संघ का आधार रहा है। फिर लगातार शासन से यह आधार और मजबूत हो गया। इस तोड़ने के लिए एक बड़े झटके की जरूरत थी। और वह काम किया दिग्विजय सिंह ने।

भोपाल में दिग्विजय के खिलाफ भाजपा ने जो साध्वी कार्ड खेला है वही उसे उल्टा पड़ गया। दरअसल वास्तविक रूप से इस समय दिग्विजय कि छवि नर्मदा यात्री की बनी हुई है। जिसने लगातार छह महीने से ज्यादा पदयात्रा करके लगभग 3500 किलोमीटर की नर्मदा परिक्कमा पूरी की हो। यह एक बहुत कठिन यात्रा होती है जिसे दिग्विजय ने सपत्नीक अपनी धार्मिक आस्था के साथ पूर्ण किया। उनकी पत्रकार पत्नी अमृता सिंह ने भी पूरी यात्रा पैदल पूरी की। आम जनता के अलावा राज्य के साधु संत भी इससे काफी प्रभावित हैं। खुद
केन्द्रीय मंत्री उमाभारती ने इसके लिए पत्र लिखकर दिग्विजय को साधुवाद दिया था और यात्रा में शामिल न हो पाने का दुख जताया था।

आज मध्य प्रदेश और खासतौर से भोपाल में सबसे ज्यादा चर्चा यही है कि दिग्विजय जो कहते हैं वह करते हैं। अगर उन्होने नर्मदा का पानी भोपाल लाने का ऐलान किया है तो वह इसे अमली जामा पहना कर ही मानेंगे।

अमृता सिंह ने साफ तौर पर पत्र में लिखा है कि दिग्विजय सिंह का स्पष्ट कहना है कि उनके दरवाजे राजनीतिक रूप से पक्ष विपक्ष सबके लिए खुले रहते हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर की फेसबुक वॉल से साभार)

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