1977 में जनता पार्टी की हवा में भी जीतने वाले दिग्विजय का भोपाल चुनाव देश भर में चर्चा का विषय

ताल में भोपाल ताल की तरह इस लोकसभा चुनाव में भोपाल चुनाव मशहूर हो गया। यूं तो देश भर में कई चर्चित लोकसभा क्षेत्र हैं मगर भोपाल में कांग्रेस के शिखर नेता दिग्विजय सिंह ने जिस तरह हवा पलटी उससे इन चुनावों का पूरा नरेटिव ही बदल गया। भाजपा ने प्रज्ञा सिंह को उतारकर भोपाल में तो हिंदुत्व के सवाल को केन्द्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश की साथ ही पूरे देश में इस पर हवा बनानी चाही मगर एक समय में राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु और कांग्रेस के चाणक्य कहलाए जाने वाले दिग्विजय सिंह ने भाजपा की पिच पर ही बैट संभालते हुए उसे रक्षात्मक होने पर मजबूर कर दिया।

दिग्विजय क्रिकेट के पुराने खिलाड़ी रहे हैं वे जानते हैं कि बाउंसर बाल पर बैकफुट पर जाने से कोई फायदा नहीं। इस बाल को स्टैप आउट करके बालर के सिर के उपर से ही मारना होगा। दिग्विजय ने यही किया। साध्वी के मुकाबले साधु संतों की फौज उतार दी। भोपाल में ऐसी तपती गर्मी में सैंकड़ों साधुओं को धुनी रमाते कभी किसी ने नहीं देखा था। न ही यह देखा था कि किसी प्रत्याशी के साथ सैंकड़ों भगवाधारी साधु सड़कों पर वोट मांगते हुए निकल पड़ें। भाजपा और उससे भी ज्यादा उसकी प्रत्याशी प्रज्ञा सिंह के लिए यह दिग्विजयी दांव आश्चर्यजनक और घबराने वाला था।

जबाव में प्रज्ञा सिंह भोपाल विजन लेकर आ गईं। यह एक तरह से दिग्विजय की जीत थी कि क्योंकि अब मैच वापस कांग्रेस की पिच पर खेला जाने लगा था। दिग्विजय तो अपना विजन भोपाल एक महीने पहले ही घोषित कर चुके थे। जोभोपाल में ही नहीं देश भर में चर्चा का विषय बन गया था। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा होने लगी कि हर प्रत्याशी को अपने चुनाव क्षेत्र के बारे में ऐसा ही विचार (दृष्टि पत्र) का एक मसौदा लोगों के सामने रखना चाहिए।

विकास और विजन के मानचित्र के साथ दिग्विजय की सनातनी हिन्दु छवि ने भोपाल चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया। कांग्रेस को इससे मध्य प्रदेश में तो लाभ हुआ ही देश भर में उसका माहौल बन गया। छठे चरण का चुनाव आते आते तक भाजपा का ग्राफ भी रुकने लगा। भाजपा जहां तीन सौ पार की बात कर रही थी, वहीं उसके महासचिव और आरएसएस से विशेष तौर पर भेजे गए राम माघव सहयोगी
दलों के सहयोग और गठबंधन की जरूरत बताने लगे।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जब दिग्विजय सिंह से किसी कठिन सीट से चुनाव लड़ने की बात कही थी तब शायद उन्हें भी इसका अंदाजा नहीं था कि दिग्विजय के बीड़ा उठा लेने से मध्य प्रदेश में राजनीतिक माहौल ही बदल जाएगा। स्वभाव से ही चुनौति स्वीकार करने के आदी दिग्विजय ने जब नर्मदा यात्रा की घोषणा की थी तो किसी को पता नहीं था कि उनकी यात्रा के निहितार्थ इतने दूरगामी होंगे। छह महीने से अधिक समय तक अपनी धर्मपत्नी अमृता सिंह के साथ पैदल चलकर दिग्विजय ने केवल साढ़े तीन हजार किलोमीटर की दूरी ही तय नहीं की थी बल्कि मध्य प्रदेश जिसे ह्रदय प्रदेश भी कहते हैं के लोगों दिलों में भी अपनी नई छवि स्थापित कर दी।

दिग्विजय और उनकी पत्नी अमृता सिंह की यह यात्रा कठिन तो थी मगर नर्मदा मार्ग पर रहने वाले सीधे सादे ग्रामीणों के कोमल ह्रदयों के लिए अविस्मरणीय बन गई। मार्ग में रहने वाले रोज परिक्रमाएं देखते हैं। मगर पहली बार वे इस परिक्रमा से और परिक्रमा करने वाले दिग्विजय सिंह और जिन्हें वे रानी साहिबा कहते थे उन वरिष्ठ पत्रकार अमृता सिंह से भावनात्नमक रूप से जुड़ गए। अब जब चुनाव आया तो वे भोपाल में अपने रिश्तेदारों के घर आकर या फोन करके परिक्रमावासियों का प्रचार कर रहे हैं।

दिग्विजय का यह माउथ टू माउथ प्रचार प्रज्ञा सिंह के लिए भारी पड़ सकता है। क्योंकि इससे भाजपा के लोग भी धर्मसंकट में पड़ गए। दिग्विजय की सदाशयता की कहानियां अचानक फैलने लगीं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे एक बड़े नेता ने जो बातें अपने परिवार वालों और निकटवर्ती लोगों को बताईं थी वह चर्चा में आ गई।

बात तब कि जब दिग्विजय मुख्यमंत्री थे। भाजपा के इन बड़े नेता के जवान पुत्र की असामायिक मृत्यु हो गई। मुख्यमंत्री दिगविजय ने संवेदना का फोन किया साथ ही पूछा कि क्या बहु के लिए कोई उपयुक्त नौकरी की व्यवस्था करें। भाजपा नेता ने अपने लोगों से कहा कि दिग्विजय बहुत संवेदनशील हैं। हमारी पार्टी में से किसी ने इस तरह की सहायता की पेशकश नहीं की।

राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर मानवीय आधार पर की गईं इस तरह की सहायता की कहानियां इन दिनों खूब कही और सुनी जा रही हैं। जिनमें ट्रांसफरों की भी बड़ी कहानियां हैं। मध्यप्रदेश में राजनीतिक आधार पर और यहां तक कि उसी पार्टी के असंतुष्ट गुट के नेताओं के करीबी लोगों का ट्रांसफर करवाना या रुकवाना हमेशा आम बात रही है। एक शिक्षक और अच्छे लेखक रमाशंकर चौधरी जी ने करीब तीन चार दशक पहले ट्रासंफरों की राजनीति का शिकार होने के बाद आत्महत्या कर ली थी। दिग्विजय सिंह की ट्रांसफर रुकवाने की एक कहानी भी संघ के लोगों के बीच काफी याद की जा रही है।

दिग्विजय के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद जब कांग्रेस के लोगों ने एक संघ से जुड़े नेता के शिक्षक भाई का ट्रांसफर कहीं दूर करवा दिया तो संघ के इस नेता ने भाजपा के पूर्व विधायक से सिफारिश करवाई। तत्काल फैसले लेने में विख्यात दिग्विजय ने ट्रांसफर कैंसिल करवा दिया। कांग्रेस के उस इलाके के नेता बड़े नाराज होकर दिग्विजय के पास आए। दिग्विजय ने उनसे कहा कि दूसरा कोई काम करवा लेना मगर पूर्व विधायक की इतनी बात तो मानने दो।

दिग्विजय सिंह की इसी स्पष्टवादिता और दलगत सीमाओं से परे जाकर लोगों की मदद करने से बहुत सारे लोग परेशान रहते हैं। इनमें भाजपा के लोग तो हैं ही कांग्रेस के भी लोग हैं। मगर 1977 में कांग्रेस विरोधी हवा में भी जीते दिग्विजय सिंह बयालीस साल से राजनीति के अपने तौर तरीके खुद ही तय करते आ रहे हैं। इन दिनों भी जब वे लोकसभा चुनाव में घर घर जा रहे हैं तो उनके छोटे भाई लक्ष्मण सिंह ही आश्चर्य से कहते हैं कि लोकसभा चुनावों में घर घर कौन जाता है?

1977 में केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस की भारी हार हुई खासतौर पर ग्वालियर संभाग में। मगर उस समय भी दिग्विजय ने राघोगढ़ से जीत हासिल की थी।

देश भर की आंखें अब 12 मई पर लगी हुई हैं। जिस दिन भोपाल में मतदान है। इसके बाद एक चरण का चुनाव ही और बचेगा जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाराणसी से उम्मीदवार हैं। मगर उस चुनाव में मोदी के सामने कोई बड़ा प्रतिद्वंद्वी न होने के कारण लोगों की दिलचस्पी बन नहीं पा रही है। 23 मई को चुनाव का नतीजा जो हो लेकिन अगर मुशायरे की टर्मोलोजी (भाषा) इस्तेमाल की जाए तो मुशायरा भोपाल ने लूट लिया।
(वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर की फेसबुक वॉल से साभार)

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